(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

05 उद्योगपर्व (196) Mahabarataham


॥ श्रीः ॥
5.174. अध्यायः 174
Mahabharata - Udyoga Parva - Chapter Topics
भीष्मेण विचित्रवीर्यस्य कन्यात्रयेण विवाहप्रयतने अम्बया स्वस्य साल्वकामत्वकथनपूर्वकं तत्समीपगमने भीष्मंप्रत्यनुज्ञायाचनम् ॥ 1 ॥


Mahabharata - Udyoga Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 5-174-0x(3882)(37821)
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ मातरं वीरमातरम् ।
अभिगम्योपसंगृह्य दाशेयीमिदमब्रुवम् ॥ 5-174-1(37822)
इमाः काशिपतेः कन्या मया निर्जित्य पार्थिवान् ।
विचित्रवीर्यस्य कृते वीर्यशुल्का हृता इति ॥ 5-174-2(37823)
ततो मूर्धन्युपाघ्राय पर्यश्रुनयना नृप।
आह सत्यवती हृष्टा दिष्ट्या पुत्र जितं त्वया ॥ 5-174-3(37824)
सत्यवत्यास्त्वनुमते विवाहे समुपस्थिते।
उवाच वाक्यं सव्रीडा ज्येष्ठा काशिपतेः सुता ॥ 5-174-4(37825)
भीष्म त्वमसि धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ।
श्रुत्वा च वचनं धर्म्यं मह्यं कर्तुमिहार्हसि ॥ 5-174-5(37826)
मया साल्वपत्तिः पूर्वं मनसाऽभिवृतो वरः।
तेन चास्मि वृता पूर्वं रहस्यविदिते पितुः ॥ 5-174-6(37827)
कथं मामन्यकामां त्वं राजधर्ममतीत्य वै ।
वासयेथा गृहे भीष्म कौरवः सन्विशेषतः ॥ 5-174-7(37828)
एतद्बुद्ध्या विनिश्चित्य मनसा भरतर्षभ ।
यत्क्षमं ते महाबाहो तदिहारब्धुमर्हसि ॥ 5-174-8(37829)
स मां प्रतीक्षते व्यक्तं साल्वराजो विशांपते ।
तस्मान्मां त्वं कुरुश्रेष्ठ समनुज्ञातुमर्हसि ॥ 5-174-9(37830)
कृपां कुरु महाबाहो मयि धर्मभृतां वर।
त्वं हि सत्यव्रतो वीर पृथिव्यामिति नः श्रुतम् ॥ ॥ 5-174-10(37831)

इति श्रीमन्महाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यनपर्वणि चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥

Mahabharata - Udyoga Parva - Chapter Footnotes
5-174-1 उपसंगृह्य पादयोः पतित्वा॥ 5-175-5 मह्यं मम ॥


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